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श्री महाभारत
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पर्व 13: अनुशासन पर्व
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अध्याय 116: बृहस्पतिका युधिष्ठिरसे प्राणियोंके जन्मके प्रकारका और नानाविध पापोंके फलस्वरूप नरकादिकी प्राप्ति एवं तिर्यग्योनियोंमें जन्म लेनेका वर्णन
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श्लोक 84
श्लोक
13.116.84
तत्र जीवति वर्षाणि त्रयोदश युधिष्ठिर।
अधर्मसंक्षये युक्तस्ततो जायति मानव:॥ ८४॥
अनुवाद
युधिष्ठिर! वह उस योनि में तेरह वर्ष तक रहता है। तत्पश्चात् अपने पापों का नाश होने पर पुनः मनुष्य योनि में जन्म लेता है ॥84॥
Yudhisthira! He lives in that vagina for thirteen years. Subsequently, after the extinction of his sins, he is born again in human form. 84॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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