श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 116: बृहस्पतिका युधिष्ठिरसे प्राणियोंके जन्मके प्रकारका और नानाविध पापोंके फलस्वरूप नरकादिकी प्राप्ति एवं तिर्यग्योनियोंमें जन्म लेनेका वर्णन  »  श्लोक 82
 
 
श्लोक  13.116.82 
कृमिर्जीवति वर्षाणि दश पञ्च च भारत।
अधर्मस्य क्षयं कृत्वा ततो जायति मानव:॥ ८२॥
 
 
अनुवाद
हे भारत! वह कीड़ा पंद्रह वर्ष तक जीवित रहता है, फिर अपने पापों का नाश करके मनुष्य योनि में जन्म लेता है। 82.
 
O Bharata! That insect lives for fifteen years. Then after destroying its sins, it takes birth as a human being. 82.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)