श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 116: बृहस्पतिका युधिष्ठिरसे प्राणियोंके जन्मके प्रकारका और नानाविध पापोंके फलस्वरूप नरकादिकी प्राप्ति एवं तिर्यग्योनियोंमें जन्म लेनेका वर्णन  »  श्लोक 81
 
 
श्लोक  13.116.81 
उपस्थिते विवाहे तु यज्ञे दानेऽपि वा विभो।
मोहात् करोति यो विघ्नं स मृतो जायते कृमि:॥ ८१॥
 
 
अनुवाद
हे प्रभु! जो मनुष्य आसक्तिवश विवाह, यज्ञ या दान में विघ्न डालता है, वह मरने के बाद कीड़ा बनता है ॥81॥
 
O Lord! One who, out of attachment, creates obstacles in a wedding, a sacrifice or a donation, becomes a worm after death. ॥ 81॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)