श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 116: बृहस्पतिका युधिष्ठिरसे प्राणियोंके जन्मके प्रकारका और नानाविध पापोंके फलस्वरूप नरकादिकी प्राप्ति एवं तिर्यग्योनियोंमें जन्म लेनेका वर्णन  »  श्लोक 80
 
 
श्लोक  13.116.80 
तत्र जीवति मासांस्तु कृमियोनौ चतुर्दश।
ततोऽधर्मक्षयं कृत्वा पुनर्जायति मानव:॥ ८०॥
 
 
अनुवाद
वह चौदह महीने तक उस कीट योनि में रहता है, तत्पश्चात पाप कर्म करके पुनः मनुष्य योनि में जन्म लेता है।
 
He lives in that insect form for fourteen months. Thereafter, after committing sins, he is again born as a human. 80
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)