श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 116: बृहस्पतिका युधिष्ठिरसे प्राणियोंके जन्मके प्रकारका और नानाविध पापोंके फलस्वरूप नरकादिकी प्राप्ति एवं तिर्यग्योनियोंमें जन्म लेनेका वर्णन  »  श्लोक 78-79
 
 
श्लोक  13.116.78-79 
सूकर: पञ्च वर्षाणि दश वर्षाणि श्वाविध:।
बिडाल: पञ्च वर्षाणि दश वर्षाणि कुक्कुट:॥ ७८॥
पिपीलिकस्तुमासांस्त्रीन् कीट: स्यान्मासमेव तु।
एतानासाद्य संसारान् कृमियोनौ प्रजायते॥ ७९॥
 
 
अनुवाद
पाँच वर्ष तक सूअर के रूप में रहकर वह दस वर्ष तक भेड़िया, पाँच वर्ष तक बिल्ली, दस वर्ष तक मुर्गा, तीन महीने तक चींटी और एक महीने तक कीड़े के रूप में रहता है। इन सब योनियों में भ्रमण करने के बाद वह पुनः कीड़े के रूप में जन्म लेता है॥ 78-79॥
 
After living as a pig for five years, he lives as a wolf for ten years, as a cat for five years, as a rooster for ten years, as an ant for three months and as an insect for one month. After roaming in all these incarnations, he is again born as an insect.॥ 78-79॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)