श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 116: बृहस्पतिका युधिष्ठिरसे प्राणियोंके जन्मके प्रकारका और नानाविध पापोंके फलस्वरूप नरकादिकी प्राप्ति एवं तिर्यग्योनियोंमें जन्म लेनेका वर्णन  »  श्लोक 75
 
 
श्लोक  13.116.75 
परदाराभिमर्शं तु कृत्वा जायति वै वृक:।
श्वा शृगालस्ततो गृध्रो व्याल: कङ्को बकस्तथा॥ ७५॥
 
 
अनुवाद
व्यभिचार का पाप करने के बाद मनुष्य क्रमशः भेड़िया, कुत्ता, सियार, गिद्ध, साँप, कौआ और बगुला बनता है। 7 5
 
After committing the sin of adultery, a man becomes successively a wolf, a dog, a jackal, a vulture, a snake, a crow and a heron. 7 5
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)