श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 116: बृहस्पतिका युधिष्ठिरसे प्राणियोंके जन्मके प्रकारका और नानाविध पापोंके फलस्वरूप नरकादिकी प्राप्ति एवं तिर्यग्योनियोंमें जन्म लेनेका वर्णन  »  श्लोक 68
 
 
श्लोक  13.116.68 
असूयको नरश्चापि मृतो जायति शार्ङ्गक:।
विश्वासहर्ता तु नरो मीनो जायति दुर्मति:॥ ६८॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य दूसरों में दोष देखता है, वह मृग योनि में जन्म लेता है और जो मनुष्य अपनी कुबुद्धि के कारण किसी के साथ विश्वासघात करता है, वह मछली योनि में जन्म लेता है। 68.
 
A man who finds faults in others is born in the womb of a deer and a man who betrays someone due to his bad intellect is born as a fish. 68.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)