श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 116: बृहस्पतिका युधिष्ठिरसे प्राणियोंके जन्मके प्रकारका और नानाविध पापोंके फलस्वरूप नरकादिकी प्राप्ति एवं तिर्यग्योनियोंमें जन्म लेनेका वर्णन  »  श्लोक 67
 
 
श्लोक  13.116.67 
तत्र जीवति वर्षाणि दश पञ्च च भारत।
दुष्कृतस्य क्षयं कृत्वा ततो जायति मानुष:॥ ६७॥
 
 
अनुवाद
हे भारत! वह पंद्रह वर्ष तक कीड़े के गर्भ में रहता है और अपने पापों से मुक्त होकर अन्त में मनुष्य योनि में जन्म लेता है। 67।
 
Bharat! He lives in the womb of an insect for fifteen years and after absolving himself of his sins, he is finally born as a human being. 67.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)