श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 116: बृहस्पतिका युधिष्ठिरसे प्राणियोंके जन्मके प्रकारका और नानाविध पापोंके फलस्वरूप नरकादिकी प्राप्ति एवं तिर्यग्योनियोंमें जन्म लेनेका वर्णन  »  श्लोक 64
 
 
श्लोक  13.116.64 
भर्तृपिण्डमुपाश्नन् यो राजद्विष्टानि सेवते।
सोऽपि मोहसमापन्नो मृतो जायति वानर:॥ ६४॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य राजा के टुकड़ों पर पलता है, परन्तु आसक्तिवश शत्रुओं की सेवा करता है, वह मरने के बाद बन्दर बनता है ॥ 64॥
 
A man who lives off the crumbs of the king but out of attachment serves his enemies becomes a monkey after his death. ॥ 64॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)