vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Articles
Apps
About
श्री महाभारत
»
पर्व 13: अनुशासन पर्व
»
अध्याय 116: बृहस्पतिका युधिष्ठिरसे प्राणियोंके जन्मके प्रकारका और नानाविध पापोंके फलस्वरूप नरकादिकी प्राप्ति एवं तिर्यग्योनियोंमें जन्म लेनेका वर्णन
»
श्लोक 63
श्लोक
13.116.63
कच्छपो दश वर्षाणि त्रीणि वर्षाणि शल्यक:।
व्यालो भूत्वा च षण्मासांस्ततो जायति मानुष:॥ ६३॥
अनुवाद
दस वर्ष तक कछुआ रहने के बाद वह तीन वर्ष तक साही और छः माह तक सर्प बनता है। तत्पश्चात् वह मनुष्य योनि में जन्म लेता है। 63.
After being a tortoise for ten years, he becomes a porcupine for three years and a snake for six months. After that he is born as a human being. 63.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×