श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 116: बृहस्पतिका युधिष्ठिरसे प्राणियोंके जन्मके प्रकारका और नानाविध पापोंके फलस्वरूप नरकादिकी प्राप्ति एवं तिर्यग्योनियोंमें जन्म लेनेका वर्णन  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  13.116.6 
वैशम्पायन उवाच
तयो: संवदतोरेवं पार्थगांगेययोस्तदा।
आजगाम विशुद्धात्मा नाकपृष्ठाद् बृहस्पति:॥ ६॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय! जब कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर और गंगनन्दन भीष्म इस प्रकार वार्तालाप कर रहे थे, उसी समय शुद्ध हृदयवाले बृहस्पतिजी स्वर्ग से वहाँ आये। 6॥
 
Vaishampayanji says – Janamejaya! While Kunti's son Yudhishthir and Ganganandan Bhishma were having such a conversation, Brihaspatiji, having a pure heart, arrived there from heaven. 6॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)