श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 116: बृहस्पतिका युधिष्ठिरसे प्राणियोंके जन्मके प्रकारका और नानाविध पापोंके फलस्वरूप नरकादिकी प्राप्ति एवं तिर्यग्योनियोंमें जन्म लेनेका वर्णन  »  श्लोक 54
 
 
श्लोक  13.116.54 
मनसापि गुरोर्भार्यां य: शिष्यो याति पापकृत्।
स उग्रान् प्रैति संसारानधर्मेणेह चेतसा॥ ५४॥
 
 
अनुवाद
जो पापी शिष्य अपने गुरु की पत्नी के साथ समागम का विचार भी करता है, वह अपने मानसिक पापों के कारण भयंकर योनियों में जन्म लेता है ॥ 54॥
 
The sinful disciple who even thinks of having intercourse with his guru's wife takes birth in terrible wombs due to his mental sins. ॥ 54॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)