vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Apps
About
Contact
श्री महाभारत
»
पर्व 13: अनुशासन पर्व
»
अध्याय 116: बृहस्पतिका युधिष्ठिरसे प्राणियोंके जन्मके प्रकारका और नानाविध पापोंके फलस्वरूप नरकादिकी प्राप्ति एवं तिर्यग्योनियोंमें जन्म लेनेका वर्णन
»
श्लोक 54
श्लोक
13.116.54
मनसापि गुरोर्भार्यां य: शिष्यो याति पापकृत्।
स उग्रान् प्रैति संसारानधर्मेणेह चेतसा॥ ५४॥
अनुवाद
जो पापी शिष्य अपने गुरु की पत्नी के साथ समागम का विचार भी करता है, वह अपने मानसिक पापों के कारण भयंकर योनियों में जन्म लेता है ॥ 54॥
The sinful disciple who even thinks of having intercourse with his guru's wife takes birth in terrible wombs due to his mental sins. ॥ 54॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
About Us
|
Contact Us
|
Privacy Policy
|
Connect Form
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×