श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 116: बृहस्पतिका युधिष्ठिरसे प्राणियोंके जन्मके प्रकारका और नानाविध पापोंके फलस्वरूप नरकादिकी प्राप्ति एवं तिर्यग्योनियोंमें जन्म लेनेका वर्णन  »  श्लोक 52-53
 
 
श्लोक  13.116.52-53 
उपाध्यायस्य य: पापं शिष्य: कुर्यादबुद्धिमान्।
स जीव इह संसारांस्त्रीनाप्नोति न संशय:॥ ५२॥
प्राक् श्वा भवति राजेन्द्र तत: क्रव्यात्तत: खर:।
तत: प्रेत: परिक्लिष्ट: पश्चाज्जायति ब्राह्मण:॥ ५३॥
 
 
अनुवाद
जो मूर्ख शिष्य अपने गुरु का अपमान करता है, वह निम्नलिखित तीन योनियों में जन्म लेता है, इसमें संशय नहीं है। राजेन्द्र! वह पहले कुत्ते, फिर राक्षस और फिर गधे के रूप में जन्म लेता है। तत्पश्चात प्रेत योनि में मरकर अनेक कष्ट भोगने के पश्चात् ब्राह्मण योनि में जन्म लेता है। 52-53।
 
The foolish student who offends his teacher is born in the following three species, there is no doubt about it. Rajendra! First he is born as a dog, then a demon and then a donkey. After that, after dying and suffering many hardships in the ghostly state, he is born as a Brahmin. 52-53.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)