श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 116: बृहस्पतिका युधिष्ठिरसे प्राणियोंके जन्मके प्रकारका और नानाविध पापोंके फलस्वरूप नरकादिकी प्राप्ति एवं तिर्यग्योनियोंमें जन्म लेनेका वर्णन  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  13.116.5 
नैतदन्येन शक्यं हि वक्तुं केनचिदद्य वै।
वक्ता बृहस्पतिसमो न ह्यन्यो विद्यते क्वचित्॥ ५॥
 
 
अनुवाद
आज इस विषय को कोई दूसरा नहीं समझा सकता। बृहस्पतिजी के समान अन्य कोई वक्ता कहीं भी नहीं है ॥5॥
 
Today no one else can explain this topic. There is no other speaker anywhere who can be like Brihaspatiji. ॥ 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)