श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 116: बृहस्पतिका युधिष्ठिरसे प्राणियोंके जन्मके प्रकारका और नानाविध पापोंके फलस्वरूप नरकादिकी प्राप्ति एवं तिर्यग्योनियोंमें जन्म लेनेका वर्णन  »  श्लोक 49
 
 
श्लोक  13.116.49 
पतितं याजयित्वा तु कृमियोनौ प्रजायते।
तत्र जीवति वर्षाणि दश पञ्च च भारत॥ ४९॥
 
 
अनुवाद
हे भारत! जो ब्राह्मण पतित मनुष्य का यज्ञ करता है, वह मरने के बाद कीड़े की योनि में जन्म लेता है और उस योनि में पंद्रह वर्ष तक रहता है ॥ 49॥
 
O Bharata! The Brahmin who performs the sacrifice of a fallen man, after death is born in the womb of an insect and lives in that womb for fifteen years. ॥ 49॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)