vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Apps
About
Contact
श्री महाभारत
»
पर्व 13: अनुशासन पर्व
»
अध्याय 116: बृहस्पतिका युधिष्ठिरसे प्राणियोंके जन्मके प्रकारका और नानाविध पापोंके फलस्वरूप नरकादिकी प्राप्ति एवं तिर्यग्योनियोंमें जन्म लेनेका वर्णन
»
श्लोक 45
श्लोक
13.116.45
येन येन तु भावेन कर्मणा पुरुषो गतिम्।
प्रयाति परुषां घोरां तत्ते वक्ष्याम्यत: परम्॥ ४५॥
अनुवाद
अब मैं उन नाना भावों और कर्मों का वर्णन कर रहा हूँ जिनके द्वारा मनुष्य निर्दयी और भयंकर गति को प्राप्त होता है ॥ 45॥
I am now describing the various feelings and actions by which a man attains a ruthless and terrible fate. ॥ 45॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
About Us
|
Contact Us
|
Privacy Policy
|
Connect Form
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×