श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 116: बृहस्पतिका युधिष्ठिरसे प्राणियोंके जन्मके प्रकारका और नानाविध पापोंके फलस्वरूप नरकादिकी प्राप्ति एवं तिर्यग्योनियोंमें जन्म लेनेका वर्णन  »  श्लोक 39
 
 
श्लोक  13.116.39 
अथान्तरा तु धर्मस्याप्यधर्ममुपसेवते।
सुखस्यानन्तरं दु:खं स जीवोऽप्यधिगच्छति॥ ३९॥
 
 
अनुवाद
परंतु यदि वह धर्म का पालन करते हुए कभी अधर्म का कार्य कर बैठता है, तो सुख पाकर भी उसे दुःख भोगना पड़ता है ॥39॥
 
But if, while following Dharma, he sometimes commits an act of Adharma, then after getting happiness, he has to suffer sorrow as well. ॥ 39॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)