श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 116: बृहस्पतिका युधिष्ठिरसे प्राणियोंके जन्मके प्रकारका और नानाविध पापोंके फलस्वरूप नरकादिकी प्राप्ति एवं तिर्यग्योनियोंमें जन्म लेनेका वर्णन  »  श्लोक 37-38
 
 
श्लोक  13.116.37-38 
इहलोके च स प्राणी जन्मप्रभृति पार्थिव।
सुकृतं कर्म वै भुङ्‍‍क्ते धर्मस्य फलमाश्रित:॥ ३७॥
यदि धर्मं यथाशक्ति जन्मप्रभृति सेवते।
तत: स पुरुषो भूत्वा सेवते नित्यदा सुखम्॥ ३८॥
 
 
अनुवाद
पृथ्वीनाथ! यदि कोई प्राणी जन्म से ही पुण्य कर्मों में लगा रहता है, तो वह धर्म के फल का आश्रय लेकर उसके अनुसार सुख भोगता है। यदि वह बचपन से ही अपनी क्षमतानुसार धर्म का आचरण करता है, तो वह मनुष्य रूप में सदैव सुख भोगता है।
 
Prithvinath! If a being is engaged in pious deeds from birth, then he takes shelter of the fruits of Dharma and enjoys happiness accordingly. If he practices Dharma from childhood according to his ability, then he experiences happiness forever as a human being.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)