श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 116: बृहस्पतिका युधिष्ठिरसे प्राणियोंके जन्मके प्रकारका और नानाविध पापोंके फलस्वरूप नरकादिकी प्राप्ति एवं तिर्यग्योनियोंमें जन्म लेनेका वर्णन  »  श्लोक 24-25
 
 
श्लोक  13.116.24-25 
ततो धर्मसमायुक्त: प्राप्नुते जीव एव हि॥ २४॥
ततोऽस्य कर्म पश्यन्ति शुभं वा यदि वाशुभम्।
देवता: पञ्चभूतस्था: किं भूय: श्रोतुमिच्छसि॥ २५॥
 
 
अनुवाद
अतः सद्गुणी जीव ही परम मोक्ष को प्राप्त होता है। फिर जब जीव परलोक में अपने कर्मों का फल भोगकर दूसरा शरीर धारण करता है, तब उसके शरीर के पंचभूतों में स्थित अधिष्ठाता देवता उस जीव के शुभ-अशुभ कर्मों को देखते हैं। अब और क्या सुनना चाहते हो?॥24-25॥
 
Therefore, only a living being with virtue attains the ultimate salvation. Then when a living being finishes the fruits of his deeds in the next world and takes another body, then the presiding deities situated in the five elements of his body see the good and bad deeds of that living being. Now what else do you want to hear?॥24-25॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)