श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 116: बृहस्पतिका युधिष्ठिरसे प्राणियोंके जन्मके प्रकारका और नानाविध पापोंके फलस्वरूप नरकादिकी प्राप्ति एवं तिर्यग्योनियोंमें जन्म लेनेका वर्णन  »  श्लोक 17-18h
 
 
श्लोक  13.116.17-18h 
लोभान्मोहादनुक्रोशाद् भयाद् वाप्यबहुश्रुत:॥ १७॥
नर: करोत्यकार्याणि परार्थे लोभमोहित:।
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य अशिक्षित है, वह लोभ और आसक्ति के वश होकर दूसरों के लिए ऐसे पाप करता है, जो लोभ, आसक्ति, दया या भय से नहीं करने चाहिए ॥17 1/2॥
 
He who is not well-read, under the influence of greed and attachment, ends up committing sins for others which should not be done out of greed, attachment, pity or fear. ॥17 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)