अपरस्मिन् कथायोगे भूय: श्रोष्यसि भारत।
एतन्मया महाराज ब्रह्मणो वदत: पुरा॥ १३२॥
सुरर्षीणां श्रुतं मध्ये पृष्टश्चापि यथातथम्।
मयापि तच्च कात्स्न्र्येन यथावदनुवर्णितम्।
एतच्छ्रुत्वा महाराज धर्मे कुरु मन: सदा॥ १३३॥
अनुवाद
भरतनंदन! अब इस विषय को दूसरे वार्तालाप के संदर्भ में सुनिए। महाराज! पूर्वकाल में ब्रह्माजी ऋषियों के बीच यह प्रसंग सुना रहे थे। वहाँ मैंने उनके मुख से ये सब बातें सुनीं और आपके पूछने पर मैंने उन सब बातों का यथार्थ रूप में वर्णन भी किया है। राजन! इसे सुनकर आपको सदैव धर्म में ही मन लगाना चाहिए। 132-133।
Bharatanandan! Now listen to this topic in the context of another conversation. Maharaj! In the past, Brahmaji was narrating this episode among the sages. There I heard all these things from his mouth and when you asked me, I have also described all those things in true form. King! After listening to this, you should always concentrate on religion. 132-133.
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि संसारचक्रं नाम एकादशाधिकशततमोऽध्याय:॥ १११॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें संसारचक्र नामक एक सौ ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १११॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)