श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 116: बृहस्पतिका युधिष्ठिरसे प्राणियोंके जन्मके प्रकारका और नानाविध पापोंके फलस्वरूप नरकादिकी प्राप्ति एवं तिर्यग्योनियोंमें जन्म लेनेका वर्णन  »  श्लोक 131
 
 
श्लोक  13.116.131 
परस्वहरणे दोषा: सर्व एव प्रकीर्तिता:।
एतद्धि लेशमात्रेण कथितं ते मयानघ॥ १३१॥
 
 
अनुवाद
हे पापरहित राजन! दूसरे का धन चुराने से जो पाप होते हैं, वे सब यहाँ वर्णित हैं। यहाँ मैंने संक्षेप में उस विषय का वर्णन किया है॥131॥
 
O sinless king! All the sins that are caused by stealing someone else's wealth have been described. Here I have briefly explained the subject.॥ 131॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)