श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 116: बृहस्पतिका युधिष्ठिरसे प्राणियोंके जन्मके प्रकारका और नानाविध पापोंके फलस्वरूप नरकादिकी प्राप्ति एवं तिर्यग्योनियोंमें जन्म लेनेका वर्णन  »  श्लोक 127-128
 
 
श्लोक  13.116.127-128 
ये पापानि नरा: कृत्वा निरस्यन्ति व्रतै: सदा।
सुखदु:खसमायुक्ता व्यथितास्ते भवन्त्युत॥ १२७॥
असंवासा: प्रजायन्ते म्लेच्छाश्चापि न संशय:।
नरा: पापसमाचारा लोभमोहसमन्विता:॥ १२८॥
 
 
अनुवाद
जो पापी मनुष्य लोभ और मोह के वशीभूत होकर पाप करते हैं और व्रत आदि से उनसे छुटकारा पाने का प्रयत्न करते हैं, वे सुख-दुःख भोगते हुए सदैव दुःखी रहते हैं। उन्हें कहीं भी रहने का स्थान नहीं मिलता और वे म्लेच्छ होकर राक्षस बनकर घूमते हैं। इसमें कोई संदेह नहीं है। ॥127-128॥
 
Those sinful men who, under the influence of greed and attachment, commit sins and try to get rid of them by fasting etc., are always distressed while experiencing happiness and sorrow. They do not get a place to live anywhere and become mlecchas and roam around like devils. There is no doubt in this. ॥127-128॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)