श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 116: बृहस्पतिका युधिष्ठिरसे प्राणियोंके जन्मके प्रकारका और नानाविध पापोंके फलस्वरूप नरकादिकी प्राप्ति एवं तिर्यग्योनियोंमें जन्म लेनेका वर्णन  »  श्लोक 124
 
 
श्लोक  13.116.124 
विश्वासेन तु निक्षिप्तं यो विनिह्नोति मानव:।
स गतायुर्नरस्तात मत्स्ययोनौ प्रजायते॥ १२४॥
 
 
अनुवाद
हे पिता! जो मनुष्य दूसरे की अमानत हड़प लेता है, वह मरने के बाद मछली के रूप में जन्म लेता है। 124.
 
O father, a person who usurps the trust belonging to another, is born as a fish after his death. 124.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)