श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 116: बृहस्पतिका युधिष्ठिरसे प्राणियोंके जन्मके प्रकारका और नानाविध पापोंके फलस्वरूप नरकादिकी प्राप्ति एवं तिर्यग्योनियोंमें जन्म लेनेका वर्णन  »  श्लोक 122-123
 
 
श्लोक  13.116.122-123 
घृतं हृत्वा तु दुर्बुद्धि: काकमद्‍गु: प्रजायते॥ १२२॥
मत्स्यमांसमथो हृत्वा काको जायति दुर्मति:।
लवणं चोरयित्वा तु चिरिकाक: प्रजायते॥ १२३॥
 
 
अनुवाद
जो मूर्ख मनुष्य घी चुराता है, वह काकमड्गू (सींग वाला जलपक्षी) होता है। जो मूर्ख मनुष्य मछली और मांस चुराता है, वह कौआ होता है। नमक चुराने से मनुष्य को चिरिका योनि में जन्म लेना पड़ता है ॥122-123॥
 
The foolish man who steals ghee becomes a Kakamadgu (a horned water bird). The foolish man who steals fish and meat becomes a crow. By stealing salt, a man has to take birth in the Chirikaka Yoni. ॥122-123॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)