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श्री महाभारत
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पर्व 13: अनुशासन पर्व
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अध्याय 116: बृहस्पतिका युधिष्ठिरसे प्राणियोंके जन्मके प्रकारका और नानाविध पापोंके फलस्वरूप नरकादिकी प्राप्ति एवं तिर्यग्योनियोंमें जन्म लेनेका वर्णन
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श्लोक 118
श्लोक
13.116.118
तत: पश्चान्महाराज कृमियोनौ प्रजायते।
कृमिर्विंशतिवर्षाणि भूत्वा जायति मानुष:॥ ११८॥
अनुवाद
महाराज ! तत्पश्चात् वह कीड़े की योनि में जन्म लेता है और बीस वर्ष तक गर्भ में रहने के पश्चात् अन्त में मनुष्य बनता है ॥118॥
Maharaj! Thereafter he is born in the womb of an insect and after staying in the womb for twenty years he finally becomes a human being. ॥ 118॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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