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श्री महाभारत
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पर्व 13: अनुशासन पर्व
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अध्याय 116: बृहस्पतिका युधिष्ठिरसे प्राणियोंके जन्मके प्रकारका और नानाविध पापोंके फलस्वरूप नरकादिकी प्राप्ति एवं तिर्यग्योनियोंमें जन्म लेनेका वर्णन
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श्लोक 11-12h
श्लोक
13.116.11-12h
बृहस्पतिरुवाच
एक: प्रसूयते राजन्नेक एव विनश्यति॥ ११॥
एकस्तरति दुर्गाणि गच्छत्येकस्तु दुर्गतिम्।
अनुवाद
बृहस्पति जी बोले - हे राजन! जीव अकेला ही जन्म लेता है, अकेला ही मरता है, अकेला ही दुःखों को भोगता है और अकेला ही दुर्भाग्य भोगता है ॥ 11 1/2॥
Brihaspati Ji said - O King! A living being is born alone, dies alone, overcomes sorrows alone and suffers misfortunes alone. ॥ 11 1/2॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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