श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 116: बृहस्पतिका युधिष्ठिरसे प्राणियोंके जन्मके प्रकारका और नानाविध पापोंके फलस्वरूप नरकादिकी प्राप्ति एवं तिर्यग्योनियोंमें जन्म लेनेका वर्णन  »  श्लोक 108-109
 
 
श्लोक  13.116.108-109 
वर्णकादींस्तथा गन्धांश्चोरयित्वेह मानव:॥ १०८॥
छुच्छुन्दरित्वमाप्नोति राजँल्लोभपरायण:।
तत्र जीवति वर्षाणि ततो दश च पञ्च च॥ १०९॥
 
 
अनुवाद
राजा! जो मनुष्य लोभ के वशीभूत होकर रंजक (लगाव) आदि तथा चंदन की चोरी करता है, वह चूहा बनता है और उस योनि में पंद्रह वर्ष तक रहता है ॥108-109॥
 
King! The person who, under the influence of greed, steals pigments (application) etc. and sandalwood, becomes a rat. He lives in that form for fifteen years. ॥108-109॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)