श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 116: बृहस्पतिका युधिष्ठिरसे प्राणियोंके जन्मके प्रकारका और नानाविध पापोंके फलस्वरूप नरकादिकी प्राप्ति एवं तिर्यग्योनियोंमें जन्म लेनेका वर्णन  »  श्लोक 104
 
 
श्लोक  13.116.104 
पत्रोर्णं चोरयित्वा तु कृकलत्वं निगच्छति।
कौशिकं तु ततो हृत्वा नरो जायति वर्तक:॥ १०४॥
 
 
अनुवाद
जो ऊनी वस्त्र चुराता है, वह कृकल (गिरगिट) की योनि में जन्म लेता है। जो रेशमी वस्त्र चुराता है, वह बत्तख बनता है ॥104॥
 
The one who steals woolen clothes is born in the womb of a Krikal (chameleon). A man becomes a duck if he steals a silk cloth. 104॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)