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श्री महाभारत
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पर्व 13: अनुशासन पर्व
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अध्याय 116: बृहस्पतिका युधिष्ठिरसे प्राणियोंके जन्मके प्रकारका और नानाविध पापोंके फलस्वरूप नरकादिकी प्राप्ति एवं तिर्यग्योनियोंमें जन्म लेनेका वर्णन
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श्लोक 103
श्लोक
13.116.103
राजतं भाजनं हृत्वा कपोत: सम्प्रजायते।
हृत्वा तु काञ्चनं भाण्डं कृमियोनौ प्रजायते॥ १०३॥
अनुवाद
चाँदी का बर्तन चुरानेवाला कबूतर होता है और सोने का बर्तन चुरानेवाला मनुष्य कीड़े की योनि में जन्म लेता है । 103॥
The one who steals a silver utensil is a pigeon and after stealing a golden utensil a man has to be born in the form of an insect. 103॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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