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mahabharat 13.115.8: शतभिषा को मुस्कान, मघा को नाक, मृगशिरा को नेत्र तथा मित्रा (अनुराधा) को मस्तक समझो। 8.   |   mahabharat अध्याय 13.115: रूप-सौन्दर्य और लोकप्रियताकी प्राप्तिके लिये मार्गशीर्षमासमें चन्द्र-व्रत करनेका प्रतिपादन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.115.8 
हासं शतभिषां चैव मघां चैवाथ नासिकाम्।
नेत्रे मृगशिरो विद्याल्ललाटे मित्रमेव तु॥ ८॥
 
 
अनुवाद
शतभिषा को मुस्कान, मघा को नाक, मृगशिरा को नेत्र तथा मित्रा (अनुराधा) को मस्तक समझो। 8.
 
Consider Shatabhisha as the smile, Magha as the nose, Mrigshira as the eyes and Mitra (Anuradha) as the forehead. 8.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)