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mahabharat 13.115.2: युधिष्ठिर बोले, "पितामह! मनुष्य के अंगों को सुन्दरता का सौभाग्य कैसे प्राप्त होता है? कोई व्यक्ति कैसे प्रसिद्ध होता है? धर्म, अर्थ और काम से युक्त मनुष्य सुख का भागी कैसे हो सकता है?"॥2॥   |   mahabharat अध्याय 13.115: रूप-सौन्दर्य और लोकप्रियताकी प्राप्तिके लिये मार्गशीर्षमासमें चन्द्र-व्रत करनेका प्रतिपादन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.115.2 
युधिष्ठिर उवाच
अङ्गानां रूपसौभाग्यं प्रियं चैव कथं भवेत्।
धर्मार्थकामसंयुक्त: सुखभागी कथं भवेत्॥ २॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर बोले, "पितामह! मनुष्य के अंगों को सुन्दरता का सौभाग्य कैसे प्राप्त होता है? कोई व्यक्ति कैसे प्रसिद्ध होता है? धर्म, अर्थ और काम से युक्त मनुष्य सुख का भागी कैसे हो सकता है?"॥2॥
 
Yudhishthira said, "Grandfather! How do the body parts of a human being get the fortune of being beautiful? How does a person become popular? How can a man who is endowed with Dharma, Artha and Kama be a part of happiness?"॥2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)