युधिष्ठिर उवाच
अङ्गानां रूपसौभाग्यं प्रियं चैव कथं भवेत्।
धर्मार्थकामसंयुक्त: सुखभागी कथं भवेत्॥ २॥
अनुवाद
युधिष्ठिर बोले, "पितामह! मनुष्य के अंगों को सुन्दरता का सौभाग्य कैसे प्राप्त होता है? कोई व्यक्ति कैसे प्रसिद्ध होता है? धर्म, अर्थ और काम से युक्त मनुष्य सुख का भागी कैसे हो सकता है?"॥2॥
Yudhishthira said, "Grandfather! How do the body parts of a human being get the fortune of being beautiful? How does a person become popular? How can a man who is endowed with Dharma, Artha and Kama be a part of happiness?"॥2॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥