श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 115: रूप-सौन्दर्य और लोकप्रियताकी प्राप्तिके लिये मार्गशीर्षमासमें चन्द्र-व्रत करनेका प्रतिपादन  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  13.115.1 
वैशम्पायन उवाच
शरतल्पगतं भीष्मं वृद्धं कुरुपितामहम्।
उपगम्य महाप्राज्ञ: पर्यपृच्छद् युधिष्ठिर:॥ १॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! महाज्ञानी युधिष्ठिर ने बाणों की शय्या पर शयन कर रहे कुरुकुल के वृद्ध पितामह भीष्मजी के पास जाकर यह प्रश्न पूछा।
 
Vaishampayanji says – Janamejaya! The great wise Yudhishthir went near Bhishmaji, the old grandfather of Kurukula, who was sleeping on the arrow bed and asked this question.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)