श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 113: मानस तथा पार्थिव तीर्थकी महत्ता  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  13.113.9 
नोदकक्लिन्नगात्रस्तु स्नात इत्यभिधीयते।
स स्नातो यो दमस्नात: स बाह्याभ्यन्तर: शुचि:॥ ९॥
 
 
अनुवाद
केवल शरीर को जल में भिगो देने को स्नान नहीं कहते। सच्चा स्नान तो वही करता है जिसने मन और इन्द्रियों के संयम रूपी जल में डुबकी लगाई हो। वह बाहर से भी शुद्ध माना जाता है और भीतर से भी।॥9॥
 
Just soaking the body in water is not called bathing. A true bath is taken only by the one who has taken a dip in the water of restraint of the mind and senses. He is considered pure from outside as well as inside.॥9॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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