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mahabharat 13.113.5: जो ममता, अहंकार, राग-द्वेष, द्वन्द्व और आसक्ति से रहित हैं तथा भिक्षा द्वारा अपना जीवन निर्वाह करते हैं, वे शुद्ध अन्तःकरण वाले मुनिगण तीर्थस्वरूप हैं॥5॥   |   mahabharat अध्याय 13.113: मानस तथा पार्थिव तीर्थकी महत्ता   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 113: मानस तथा पार्थिव तीर्थकी महत्ता  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  13.113.5 
निर्ममा निरहंकारा निर्द्वन्द्वा निष्परिग्रहा:।
शुचयस्तीर्थभूतास्ते ये भैक्ष्यमुपभुञ्जते॥ ५॥
 
 
अनुवाद
जो ममता, अहंकार, राग-द्वेष, द्वन्द्व और आसक्ति से रहित हैं तथा भिक्षा द्वारा अपना जीवन निर्वाह करते हैं, वे शुद्ध अन्तःकरण वाले मुनिगण तीर्थस्वरूप हैं॥5॥
 
Those who are free from affection, ego, love-hate conflict and attachment and live their lives by alms, those sages with pure conscience are the embodiment of pilgrimage. 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)