| श्री महाभारत » पर्व 13: अनुशासन पर्व » अध्याय 113: मानस तथा पार्थिव तीर्थकी महत्ता » श्लोक 3 |
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| | | | श्लोक 13.113.3  | अगाधे विमले शुद्धे सत्यतोये धृतिह्रदे।
स्नातव्यं मानसे तीर्थे सत्त्वमालम्ब्य शाश्वतम्॥ ३॥ | | | | | | अनुवाद | | जिसमें धैर्य रूपी तालाब और सत्य रूपी जल भरा हुआ है तथा जो गहरा, स्वच्छ और अत्यंत पवित्र है, उस मानस तीर्थ में भगवान का आश्रय लेकर सदैव स्नान करना चाहिए॥3॥ | | | | In which the pond in the form of patience and water in the form of truth is filled and which is deep, clean and extremely pure, one should always take bath in that Manas Tirtha by taking shelter of God. 3॥ | | ✨ ai-generated | | |
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