श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 113: मानस तथा पार्थिव तीर्थकी महत्ता  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  13.113.14 
समारोपितशौचस्तु नित्यं भावसमाहित:।
केवलं गुणसम्पन्न: शुचिरेव नर: सदा॥ १४॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य सदैव अच्छे आचरण वाला, शुद्ध भाव वाला और केवल गुणों से सुशोभित रहता है, उस मनुष्य को सदैव शुद्ध समझना चाहिए ॥14॥
 
The person who is always well behaved, has pure feelings and is adorned only with virtues, that person should always be considered pure. 14॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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