श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 113: मानस तथा पार्थिव तीर्थकी महत्ता  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  13.113.10 
अतीतेष्वनपेक्षा ये प्राप्तेष्वर्थेषु निर्ममा:।
शौचमेव परं तेषां येषां नोत्पद्यते स्पृहा॥ १०॥
 
 
अनुवाद
जो लोग अतीत या खोई हुई वस्तु की आशा नहीं करते, जो प्राप्त वस्तुओं में आसक्ति से रहित हैं और जिनके मन में कोई कामना उत्पन्न नहीं होती, वे ही परम पवित्रता को प्राप्त होते हैं ॥10॥
 
Those who do not expect anything past or lost, who are devoid of any attachment to the things they have acquired and in whose mind no desires arise, they alone attain supreme purity. ॥10॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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