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mahabharat 13.112.86-87h: उस दिव्य लोक में वह एक हजार कल्पों तक दिव्य कुमारियों का संग करता है और अमृत के समान उत्तम सूत्रों का पान करता है।   |   mahabharat अध्याय 13.112: दरिद्रोंके लिये यज्ञतुल्य फल देनेवाले उपवास-व्रत और उसके फलका विस्तारपूर्वक वर्णन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.112.86-87h 
तत्र कल्पसहस्रं स कन्याभि: सह मोदते॥ ८६॥
सुधारसं च भुञ्जीत अमृतोपममुत्तमम्।
 
 
अनुवाद
उस दिव्य लोक में वह एक हजार कल्पों तक दिव्य कुमारियों का संग करता है और अमृत के समान उत्तम सूत्रों का पान करता है।
 
In that divine world he enjoys the company of celestial maidens for a thousand kalpas and drinks the excellent sutras which are like nectar. 86 1/2
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)