श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 112: दरिद्रोंके लिये यज्ञतुल्य फल देनेवाले उपवास-व्रत और उसके फलका विस्तारपूर्वक वर्णन  »  श्लोक 82-83h
 
 
श्लोक  13.112.82-83h 
चन्द्रादित्यावुभौ यावद् गगने चरत: प्रभो॥ ८२॥
तावच्चरत्यसौ धीर: सुधामृतरसाशन:।
 
 
अनुवाद
हे प्रभु! जब तक सूर्य और चन्द्रमा आकाश में विचरण करते हैं, तब तक धैर्यवान मनुष्य ब्रह्मलोक में अमृत और अमृत का सेवन करता हुआ विचरण करता है।
 
O Lord! As long as the Sun and the Moon move in the sky, the patient man roams in the Brahmaloka, eating the nectar and the ambrosia. 82 1/2
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)