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श्लोक  13.112.69-70 
यस्तु पक्षे गते भुङ्‍‍क्ते एकभक्तं जितेन्द्रिय:।
सदा द्वादशमासांस्तु जुह्वानो जातवेदसम्॥ ६९॥
राजसूयसहस्रस्य फलं प्राप्नोत्यनुत्तमम्।
यानमारोहते दिव्यं हंसबर्हिणसेवितम्॥ ७०॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य अपनी इन्द्रियों को वश में रखता है, बारह महीनों तक प्रति पन्द्रहवें दिन एक बार भोजन करता है और प्रतिदिन अग्निहोत्र करता है, वह एक हजार राजसूय यज्ञों का उत्तम फल प्राप्त करता है और हंसों तथा मयूरों से युक्त दिव्य विमान पर सवार होता है।
 
He who has controlled his senses, eats once every fifteenth day for twelve months and performs Agnihotra every day, obtains the best results of a thousand Rajasuya sacrifices and rides on a divine aircraft served by swans and peacocks. 69-70.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)