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mahabharat 13.112.4-5h: अतः आप मुझसे उस अनुष्ठान का वर्णन कीजिए, जिसे दरिद्र, गुणहीन, एकाकी और असहाय व्यक्ति भी सरलता से कर सकते हैं तथा जो महान यज्ञों के समान फल देने वाला है। ॥4 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 13.112: दरिद्रोंके लिये यज्ञतुल्य फल देनेवाले उपवास-व्रत और उसके फलका विस्तारपूर्वक वर्णन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 112: दरिद्रोंके लिये यज्ञतुल्य फल देनेवाले उपवास-व्रत और उसके फलका विस्तारपूर्वक वर्णन  »  श्लोक 4-5h
 
 
श्लोक  13.112.4-5h 
यो दरिद्रैरपि विधि: शक्य: प्राप्तुं सदा भवेत्।
अर्थन्यूनैरवगुणैरेकात्मभिरसंहतै: ॥ ४॥
तुल्यो यज्ञफलैरेतैस्तन्मे ब्रूहि पितामह।
 
 
अनुवाद
अतः आप मुझसे उस अनुष्ठान का वर्णन कीजिए, जिसे दरिद्र, गुणहीन, एकाकी और असहाय व्यक्ति भी सरलता से कर सकते हैं तथा जो महान यज्ञों के समान फल देने वाला है। ॥4 1/2॥
 
Therefore, describe to me the ritual which can be performed easily even by the poor, the virtueless, the lonely and the helpless and which gives results equal to those of great yagnas. ॥ 4 1/2 ॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)