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mahabharat 13.112.26-28h: जो मनुष्य बारह महीनों तक अग्निहोत्र करता है, संध्या के तीनों समय स्नान करता है, ब्रह्मचर्य का पालन करता है, दूसरों के दोषों को नहीं देखता, साधुओं की तरह रहता है और छठे दिन एक बार भोजन करता है, उसे गोमेध यज्ञ का उत्तम फल प्राप्त होता है।   |   mahabharat अध्याय 13.112: दरिद्रोंके लिये यज्ञतुल्य फल देनेवाले उपवास-व्रत और उसके फलका विस्तारपूर्वक वर्णन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.112.26-28h 
दिवसे यस्तु षष्ठे वै मुनि: प्राशेत भोजनम्॥ २६॥
सदा द्वादशमासान् वै जुह्वानो जातवेदसम्।
सदा त्रिषवणस्नायी ब्रह्मचार्यनसूयक:॥ २७॥
गवां मेधस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोत्यनुत्तमम्।
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य बारह महीनों तक अग्निहोत्र करता है, संध्या के तीनों समय स्नान करता है, ब्रह्मचर्य का पालन करता है, दूसरों के दोषों को नहीं देखता, साधुओं की तरह रहता है और छठे दिन एक बार भोजन करता है, उसे गोमेध यज्ञ का उत्तम फल प्राप्त होता है।
 
He who performs Agnihotra for twelve months, bathes at all three times of the evening, observes celibacy, does not look at the faults of others, and lives like a sage and eats once every sixth day, he obtains the best fruits of the Gomedha Yagna. 26-27 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)