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mahabharat 13.112.21-22h: वह पुरुष दिव्य कन्याओं पर आरूढ़ होकर विमान पर सवार होकर पूर्व सागर के तट पर इन्द्रलोक में निवास करता है और वहाँ रहकर प्रतिदिन देवताओं के राजा के खेल देखता है।   |   mahabharat अध्याय 13.112: दरिद्रोंके लिये यज्ञतुल्य फल देनेवाले उपवास-व्रत और उसके फलका विस्तारपूर्वक वर्णन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.112.21-22h 
इन्द्रकन्याभिरूढं च विमानं लभते नर:।
सागरस्य च पर्यन्ते वासवं लोकमावसेत्॥ २१॥
देवराजस्य च क्रीडां नित्यकालमवेक्षते।
 
 
अनुवाद
वह पुरुष दिव्य कन्याओं पर आरूढ़ होकर विमान पर सवार होकर पूर्व सागर के तट पर इन्द्रलोक में निवास करता है और वहाँ रहकर प्रतिदिन देवताओं के राजा के खेल देखता है।
 
That man gets a plane mounted on the celestial maidens and resides in the Indraloka on the shores of the eastern ocean. Living there, he watches the sports of the King of the Gods every day.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)