श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 112: दरिद्रोंके लिये यज्ञतुल्य फल देनेवाले उपवास-व्रत और उसके फलका विस्तारपूर्वक वर्णन  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  13.112.15 
हंससारसयुक्तं च विमानं लभते नर:।
इन्द्रलोके च वसते वरस्त्रीभि: समावृत:॥ १५॥
 
 
अनुवाद
वह मनुष्य हंस और सारसों द्वारा खींचा जाने वाला विमान प्राप्त करता है और सुंदर स्त्रियों से घिरा हुआ इन्द्रलोक में रहता है॥15॥
 
That human gets a plane drawn by swans and cranes and lives in the Indraloka surrounded by beautiful women.॥ 15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)