श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 112: दरिद्रोंके लिये यज्ञतुल्य फल देनेवाले उपवास-व्रत और उसके फलका विस्तारपूर्वक वर्णन  »  श्लोक 142
 
 
श्लोक  13.112.142 
उपवासानिमान् कृत्वा गच्छेच्च परमां गतिम्।
देवद्विजातिपूजायां रतो भरतसत्तम॥ १४२॥
 
 
अनुवाद
हे भरतश्रेष्ठ! जो मनुष्य देवताओं और ब्राह्मणों की पूजा में तत्पर होकर इन व्रतों का पालन करता है, वह परम मोक्ष को प्राप्त होता है।।142।।
 
O best of the Bharatas! One who observes these fasts while being devoted to the worship of the gods and the Brahmins, attains the ultimate salvation. 142.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)