श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 112: दरिद्रोंके लिये यज्ञतुल्य फल देनेवाले उपवास-व्रत और उसके फलका विस्तारपूर्वक वर्णन  »  श्लोक 123
 
 
श्लोक  13.112.123 
विमानं सूर्यचन्द्राभं दिव्यं समधिगच्छति।
जातरूपमयं युक्तं सर्वरत्नसमन्वितम्॥ १२३॥
 
 
अनुवाद
वह सूर्य और चन्द्रमा के समान चमकने वाला, सब रत्नों से विभूषित और समस्त आवश्यक सुख-सुविधाओं से युक्त, सुवर्णमय दिव्य विमान प्राप्त करता है ॥123॥
 
He obtains a golden celestial aircraft, shining like the sun and the moon, adorned with all gems and equipped with all the necessary amenities. ॥123॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)