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mahabharat 13.112.112-113h: वह समस्त रत्नों से विभूषित, बहुमूल्य, स्फटिक के समान दिव्य विमानों से युक्त, गन्धर्वों और अप्सराओं द्वारा पूजित, दिव्य तेज से युक्त होकर देवताओं के दो हजार दिव्य युगों तक उन लोकों में आनन्द भोगता है ॥112 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 13.112: दरिद्रोंके लिये यज्ञतुल्य फल देनेवाले उपवास-व्रत और उसके फलका विस्तारपूर्वक वर्णन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 112: दरिद्रोंके लिये यज्ञतुल्य फल देनेवाले उपवास-व्रत और उसके फलका विस्तारपूर्वक वर्णन  »  श्लोक 112-113h
 
 
श्लोक  13.112.112-113h 
विमानै: स्फाटिकैर्दिव्यै: सर्वरत्नैरलंकृतै:।
गन्धर्वैरप्सरोभिश्च पूज्यमान: प्रमोदते॥ ११२॥
द्वे युगानां सहस्रे तु दिव्ये दिव्येन तेजसा।
 
 
अनुवाद
वह समस्त रत्नों से विभूषित, बहुमूल्य, स्फटिक के समान दिव्य विमानों से युक्त, गन्धर्वों और अप्सराओं द्वारा पूजित, दिव्य तेज से युक्त होकर देवताओं के दो हजार दिव्य युगों तक उन लोकों में आनन्द भोगता है ॥112 1/2॥
 
Adorned with all the gems, full of precious, crystal-like celestial planes, worshiped by the Gandharvas and Apsaras, filled with divine radiance, he enjoys bliss in those worlds for two thousand divine ages of the gods. 112 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)