श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 112: दरिद्रोंके लिये यज्ञतुल्य फल देनेवाले उपवास-व्रत और उसके फलका विस्तारपूर्वक वर्णन  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  13.112.1 
युधिष्ठिर उवाच
पितामहेन विधिवद् यज्ञा: प्रोक्ता महात्मना।
गुणाश्चैषां यथातथ्यं प्रेत्य चेह च सर्वश:॥ १॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर बोले - महात्मा पितामह ने यज्ञों का विधिपूर्वक वर्णन किया तथा इस लोक और परलोक में उनके सम्पूर्ण गुणों का भी प्रतिपादन किया ॥1॥
 
Yudhishthir said - Mahatma Pitamah described the yagyas methodically and also propounded their complete qualities in this world and in the next world. 1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)