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श्लोक 13.111.72  |
विमुच्यते चापि स सर्वसंकरै-
र्न चास्य दोषैरभिभूयते मन:।
वियोनिजानां च विजानते रुतं
ध्रुवां च कीर्तिं लभते नरोत्तम:॥ ७२॥ |
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| अनुवाद |
| वह सब प्रकार के संकीर्ण पापों से छूट जाता है और उसका मन कभी दोषों से आक्रान्त नहीं होता। इतना ही नहीं, वह महामानव अन्य योनियों में उत्पन्न प्राणियों की भाषा समझने लगता है और अनन्त यश प्राप्त करता है ॥ 72॥ |
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| He gets rid of all kinds of narrow sins and his mind is never overwhelmed by faults. Not only this, that great human being starts understanding the language of creatures born in other species and gets eternal fame. ॥ 72॥ |
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इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि उपवासविधौ षडधिकशततमोऽध्याय:॥ १०६॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें उपवास विधिविषयक एक सौ छठा अध्याय पूरा हुआ॥ १०६॥
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